आजकल टीवी में एक वाक्य बार बार सुनने में आता है की "बात करने से ही बात बनती है"। वाकई है तो यह कितनी बड़ी बात - बात करने से ही बात बनती है - । सचमुच में हमने बात करना ही बंद कर दिया है- तो बात बनेगी कैसे -हमारी पीढ़ी के साथ यही तो दिक्कत है की हम सोचते है की आखिर बनती क्यों नहीं है। हममे इतनी दुरी क्यों है। चाहते हुए भी हम इतने दूर दूर क्यों है। हमने संवाद जो बंद कर दिया है। दिक्कत तो यह है की हमे इस संवादहीनता से कोई दिक्कत भी नहीं हो रही है। रिश्ते अपनी अपनी रहो पर चल रही है। जो रिश्ता जब अपने काम का हो तभी उसकी जरूरत है वर्ना क्या फर्क पड़ता है।
इस सारी स्थिती में सोचती हु की आखिर यह संवादहीनता हमें कहा ले जायेगा। जीना के कई तनावों में आखिर यह भी एक तनाव बन जाता है। सुबह से साम तक के कई तनावों में बात न करने से उपजने वाले यह सारे तनाव भी जमा हो जाते है। देखती हु इस छोटी सी कड़ी को विज्ञापन वालो ने पकड़ कर कितना बड़ा मजमा रच दिया है। आखिर बात जो सच है। और हर बार जब टीवी पर यह वाक्य आता है तब- तब मै सोचती हु आखिर मेरे कहा - कहा बात न करने से बनती बात बन नहीं पाई...............
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सही कहा...मैं भी अभी यही सोच रही हूं कि मैंने कहां कहां बात नहीं की... जिससे वहां मेरी बात नहीं बनी...लेकिन अब भी देर नहीं हुई है। बात करने से ही शायद अब कहीं बात बन जाए।
ReplyDeletemain bhi iss baat se sahmat hoo. kai baar ham yahi sochte rahe jaate hai ki agar hamne uss vakt baat ki hoti to shayad hamari baat ban jaati.
ReplyDeleteitdiffers from man to man but but is the only solution to arrive at a better solution.
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