आजकल टीवी में एक वाक्य बार बार सुनने में आता है की "बात करने से ही बात बनती है"। वाकई है तो यह कितनी बड़ी बात - बात करने से ही बात बनती है - । सचमुच में हमने बात करना ही बंद कर दिया है- तो बात बनेगी कैसे -हमारी पीढ़ी के साथ यही तो दिक्कत है की हम सोचते है की आखिर बनती क्यों नहीं है। हममे इतनी दुरी क्यों है। चाहते हुए भी हम इतने दूर दूर क्यों है। हमने संवाद जो बंद कर दिया है। दिक्कत तो यह है की हमे इस संवादहीनता से कोई दिक्कत भी नहीं हो रही है। रिश्ते अपनी अपनी रहो पर चल रही है। जो रिश्ता जब अपने काम का हो तभी उसकी जरूरत है वर्ना क्या फर्क पड़ता है।
इस सारी स्थिती में सोचती हु की आखिर यह संवादहीनता हमें कहा ले जायेगा। जीना के कई तनावों में आखिर यह भी एक तनाव बन जाता है। सुबह से साम तक के कई तनावों में बात न करने से उपजने वाले यह सारे तनाव भी जमा हो जाते है। देखती हु इस छोटी सी कड़ी को विज्ञापन वालो ने पकड़ कर कितना बड़ा मजमा रच दिया है। आखिर बात जो सच है। और हर बार जब टीवी पर यह वाक्य आता है तब- तब मै सोचती हु आखिर मेरे कहा - कहा बात न करने से बनती बात बन नहीं पाई...............
Friday, March 26, 2010
Wednesday, March 3, 2010
कुछ दोस्तों और कुछ माननेवालो ने मुझे सलाह दी की मैं अपना ब्लॉग क्यों नहीं लिखती हु।
सोचते सोचते काफी वक़्त निकल गया की कुछ लिखा जाय। कुछ अछा पढने, कुछ अछा सोचने के बाद कुछ अछा लिखना भी कितना जरूरी होता है। फिर तकनीक का सहारा लिया और मै भी ब्लॉग पर आ गयी। खुद को अस्वासन देती हु की दिल और दिमाग में गुमड़ते सब्दो, भावों को एक लड़ी में बांधने की कोशिस तो की ही जा सकती है। हिंदी टाइप की कुछ गलतिया दिख रही है उम्मीद है ववत के साथ उनके भी उपाए मुझे मिल ही जायेंगे।
रम्भा
सोचते सोचते काफी वक़्त निकल गया की कुछ लिखा जाय। कुछ अछा पढने, कुछ अछा सोचने के बाद कुछ अछा लिखना भी कितना जरूरी होता है। फिर तकनीक का सहारा लिया और मै भी ब्लॉग पर आ गयी। खुद को अस्वासन देती हु की दिल और दिमाग में गुमड़ते सब्दो, भावों को एक लड़ी में बांधने की कोशिस तो की ही जा सकती है। हिंदी टाइप की कुछ गलतिया दिख रही है उम्मीद है ववत के साथ उनके भी उपाए मुझे मिल ही जायेंगे।
रम्भा
Subscribe to:
Comments (Atom)
