Wednesday, March 3, 2010

कुछ दोस्तों और कुछ माननेवालो ने मुझे सलाह दी की मैं अपना ब्लॉग क्यों नहीं लिखती हु।

सोचते सोचते काफी वक़्त निकल गया की कुछ लिखा जाय। कुछ अछा पढने, कुछ अछा सोचने के बाद कुछ अछा लिखना भी कितना जरूरी होता है। फिर तकनीक का सहारा लिया और मै भी ब्लॉग पर आ गयी। खुद को अस्वासन देती हु की दिल और दिमाग में गुमड़ते सब्दो, भावों को एक लड़ी में बांधने की कोशिस तो की ही जा सकती है। हिंदी टाइप की कुछ गलतिया दिख रही है उम्मीद है ववत के साथ उनके भी उपाए मुझे मिल ही जायेंगे।

रम्भा

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